गिला-शिकवा स्टेटस


तक़दीर के लिखे पर कभी शिक़वा न किया कर ऐ इंसान,
तू इतना अक़्लमंद नहीं जो भगवान के इरादे समझ सके।


भूल गए या, भुलाना चाहते हो? दूर कर दिया, या जाना चाहते हो? आजमा लिया, या आजमाना चाहते हो? मैसेज कर रहे हो या अभी और पैसे बचाना चाहते हो?


नज़र चाहती है दीदार करना; दिल चाहता है प्यार करना; क्या बतायें इस दिल का आलम; नसीब में लिखा है इंतजार करना!



जब मोहब्बत को लोग खुदा मानते हैं. 
फिर क्यूँ प्यार करने वालों को बुरा मानते हैं, 
माना कि ये ज़माना पत्थर दिल है, 
फिर क्यूँ लोग पत्थरों से दुआ माँगते हैं?


क्यों तन्हा कर देते हो यूँ दूर जाकर, 
इंतज़ार करते हैं हम बेक़रार होकर, 
वक्त बदलता है माना हमने, 
न छोड़ कर जाया करो अनजान बनकर।


मेरी मोहब्बत की न सही, 
मेरे सलीके की तो दाद दे, 
तेरा ज़िक्र रोज करते हैं 
तेरा नाम लिए वगैर।


शिकवा तो बहुत है मगर शिकायत नहीं कर सकते,
मेरे होठों को इजाजत नहीं तेरे खिलाफ बोलने की।



जब गिला शिकवा अपनों से हो तो खामोशी ही भली,
अब हर बात पे जंग हो यह जरूरी तो नहीं।


औरों से कहा तुमने… औरों से सुना तुमने, 
कभी हमसे कहा होता कभी हमसे सुना होता।



कोई चराग़ जलाता नहीं सलीक़े से,
मगर सभी को शिकवा हवा से होती है।



कोई गिला कोई शिकवा न रहे आप से,
ये आरज़ू है इक सिल सिला बना रहे आप से,
बस इक बात की उम्मीद है आप से,
दिल से दूर न करना अगर दूर भी रहें आप से।



न गिला है कोई हालात से, न शिकायेतें किसी की जात से…
खुद से सारे लफ्ज जुदा हो रहे हैं मेरी ज़िन्दगी की किताब से।


उसे किसी की मोहब्बत का ऐतबार नहीं, उसे जमाने ने शायद बहुत सताया हैै।


 



आसानी से दिल लगाये जाते है……. मगर मुश्किल से वादे निभाए जाते है………… मोहब्बत ले आती है…… उन राहों पे जहाँ दियों के बदले दिल जलाये जाते है ।।


रिश्ता नहीं रखना तो हम पर नज़र क्यों रखते हो, 
जिन्दा हैं या मर गए तुम ये खबर क्यों रखते हो..?







जितनी शिद्दत से मुझे जख्म दिया है …उसने इतनी शिद्दत से तो मैंने उसे चाहा भी ना था


तुम मेरे लिए अब कोई इल्जाम न ढूँढो, 
चाहा था तुम्हें एक यही इल्जाम बहुत है।


किरदार की अज़मत को गिरने न दिया हमने, 
धोखे तो बहुत खाए लेकिन धोखा न दिया हमने।


ख्वाहिशों का काफिला भी अजीब ही है अक्सर….. वहीँ से गुजरता है जहाँ रास्ता ना हो



तेरी बातें ही सुनाने आये दोस्त भी दिल दुखाने ही आये


दिल पे बोझ लेकर तू मुलाकात को न आ, 
मिलना है इस तरह तो बिछड़ना कबूल है।


जाने दुनिया में ऐसा क्यों होता है, 
जो सबको खुशी दे वही क्यों रोता है, 
उम्र भर जो साथ न दे सके, 
वही ज़िन्दगी का पहला प्यार क्यों होता है?


तुम बस उलझे रह गए हमें आजमाने में, 
और हम हद से गुजर गए तुम्हें चाहने में।



मोहब्बत है की नफरत है कोई इतना तो समझाए कभी मैं दिल से लड़ती हूँ कभी दिल मुझसे लड़ता है


रुलाने के बाद क्यों हँसाते है लोग जाने के बाद क्यों बुलाते है लोग…… ज़िंदगी में क्या कुछ कसर बाकी थी जो मरने के बाद भी जलाते है लोग।।।


गर जिंदगी में मिल गए फिर इत्तेफाक से, 
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम।


उनसे कह दो मुझे खमोश ही रहने दें ‘वसीम’,
लब पे आएगी तो हर बात गिराँ गुज़रेगी।


उसने इतनी शिद्दत से तो मैंने उसे चाहा भी ना था


राख से भी आएगी खुशबू मोहब्बत की, 
मेरे खत तुम सरेआम जलाया ना करो।


दिल से पूछो तो आज भी तुम मेरे ही हो, ये ओर बात है कि किस्मम दगा कर गयी


अपने अपने किये पे हैं हम दोनों इतने शर्मिंदा, दिल हम से कतराता है ओर हम दिल से कतराते है


हमसे प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते, 
खत किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते, 
किस वास्ते लिखा है हथेली पर मेरा नाम, 
मैं हर्फ़ गलत हूँ तो मिटा क्यों नहीं देते।


सपना हैं आँखों में मगर नींद नहीं है; दिल तो है जिस्म में मगर धड़कन नहीं है; कैसे बयाँ करें हम अपना हाल-ए-दिल; जी तो रहें हैं मगर ये ज़िंदगी नहीं है।


दिल से दूर जिन्हें हम कर ना सके; पास भी उन्हें हम कभी पा ना सके; मिटा दिया प्यार जिसने हमारे दिल से; हम उनका नाम लिख कर भी मिटा ना सके।


ज़िंदगी हमारी यूँ सितम हो गयी; ख़ुशी ना जाने कहाँ दफ़न हो गयी; बहुत लिखी खुदा ने लोगों की मोहब्बत; जब आयी हमारी बारी तो स्याही ही ख़त्म हो गयी।


जब प्यार नहीं है तो भुला क्यों नहीं देते; ख़त किसलिए रखे हैं जला क्यों नहीं देते; किस वास्ते लिखा है हथेली पे मेरा नाम; मैं हर्फ़ ग़लत हूँ तो मिटा क्यों नहीं देते।


मोहब्बत का मेरा यह सफर आख़िरी है; ये कागज, ये कलम, ये गजल आख़िरी है; फिर ना मिलेंगे अब तुमसे हम कभी; क्योंकि तेरे दर्द का अब ये सितम आख़िरी है।


दिल से रोये मगर होंठो से मुस्कुरा बेठे! यूँ ही हम किसी से वफ़ा निभा बेठे! वो हमे एक लम्हा न दे पाए अपने प्यार का! और हम उनके लिये जिंदगी लुटा बेठे!


मोहब्बत नहीं है कोई किताबों की बाते! समझोगे जब रो कर कुछ काटोगे रातें! जो चोरी हो गया तो पता चला दिल था हमारा! करते थे हम भी कभी किताबों की बाते!


इंतज़ार करते करते वक़्त क्यों गुजरता नहीं! सब हैं यहाँ मगर कोई अपना नहीं! दूर नहीं पर फिर भी वो पास नहीं! है दिल में कहीं पर आँखों से दूर कहीं!


हर शाम कह जाती है एक कहानी ! हर सुबह ले आती है एक नई कहानी ! रास्ते तो बदलते है हर दिन लेकिन ! मंजिल रह जाती है वही पुरानी !


मैंने रब से कहा वो छोड़ के चली गई; पता नहीं उसकी क्या मजबूरी थी; रब ने कहा इसमें उसका कोई कसूर नहीं; यह कहानी तो मैंने लिखी ही अधूरी थी।


निकले थे इसी आस पे कि किसी को अपना बना लेंगे, एक ख्वाहिश ने उम्र भर का मुसाफिर बना दिया


तुझे मोहब्बत करना नहीं आता; मुझे मोहब्बत के सिवा कुछ आता नहीं; ज़िंदगी गुज़ारने के दो ही तरीके हैं; एक तुझे नहीं आता, एक मुझे नहीं आता!



अपने सिवा बताओं कभी कुछ मिला भी है क्या तुम्हे… हजार बार ली है तुमने मेरे दिल की तलाशियाँ।


कोई जुदा हो गया कोई ख़फ़ा हो गया; यह दुनिया के लोगों को क्या हो गया; जिस सजदे में मुझे उस को माँगना था रब से; अफ़सोस वही सजदा क़ज़ा हो गया।


एक ग़ज़ल तेरे लिए ज़रूर लिखूंगा; बे-हिसाब उस में तेरा कसूर लिखूंगा; टूट गए बचपन के तेरे सारे खिलौने; अब दिलों से खेलना तेरा दस्तूर लिखूंगा।


वो रास्ते में पलटा तो रुक गया मैं भी; फिर कदम, कदम न रहे, सफर, सफर न रहा; नज़रों से गिराया उसको कुछ इस तरह हम ने; कि वो खुद अपनी नज़रों में मुताबिर न रहा।











जिन्दगी में हमेशा नए लोग मिलेंगे, कहीं ज्यादा तो कहीं कम मिलेंगे, ऐतबार जरा सोच करझ कर करना, मुमकिन नहीं हर जगह तुम्हें हम मिलेंगे।







दिल जलाने की आदत उनकी आज भी नहीं गयी, वो आज भी फूल बगल वाली कबर पर रख जाते हैं।







तेरा नजरिया मेरे नजरियें से अलग था शायद, तुझे वक्त गुजारना था ओर मुझे जिन्दगी।







कोहराम मचा रखा है जून की गर्म हवाओं ने, ओर एक तेरे दिल का मौसम है जो बदलने का नाम ही नहीं लेता।



वफा की उम्मीद मत रखों इस दुनिया में, जब दुआ कबूल नहीं होती तो लोग भगवान बदल लेते हैं।







मुद्दतें हो गयी है चुप रहते रहते, कोई सुनता तो हम भी कुछ कहते







गिले-शिकवे जरूरी हैं अगर सच्ची मोहब्बत है, जहाँ पानी बहुत गहरा हो थोड़ी कोई रहती है।


फुर्सत मिले जब भी तो रंजिशें भुला देना, कौन जाने साँसों की मोहलतें कहाँ तक हैं।








तलाशी मेरे हाथों की लेकर क्या पा लोगे तुम, 
चंद लकीरों में छिपे अधूरे से कुछ किस्से हैं।


दरवाजे बड़े करवा लिए हैं हमने भी अपने आशियाने के, क्योंकि कुछ दोस्तों का कद बड़ा हो गया है चार पैसे कमाकर



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