नौकरी शायरी

मोहब्बत और नौकरी दोनो एक जैसी होती है… इंसान करता रहेगा रोता रहेगा मगर छोड़ेगा नहीं..।।


सूरज की तपिश और बेमौसम बरसात को हमने हंस कर झेला है… मुसीबतों से भरे दलदल में हमने अपनी जिंदगी को धंस कर ठेला है…. यूँ हीं नहीं कदम चूम रही है सफलता आज इस खुले आसमान तले….. जमाने भर के नामों को पीछे छोड़ा है तब जाकर हमारा नाम फैला है।



बिना लक्ष्य के जीने वाले इंसानों की जिंदगी कहाँ अमीर होती है,…. जब मिल जाती है सफलता तो नाम ही सबसे बड़ी जागीर होती है।।।


किसी की तमन्ना थी तो किसी की उम्मीदें जुड़ी थी,…. मेरी सफलता के लिए मेहनत बहुत कड़ी थी…. पहुँच कर मुकाम पर जो मुढ़ कर देखा मैंने तो पाया कि ….. मुझसे आगे निकलने की दुनिया तमाम खड़ी थी।।।


जो शतंरज की बिसात होती जिंदगी तो… मैं सिर्फ एक मोहरा ही बन कर रह जाता,……. ये तो वो खाली किताब निकली जिसने… बादसाह बना दिया मुझको जो मैंने… खुद की किस्मत लिखनी सुरू की।।


बीत गया है रास्ता,, की आज मैं अपने मुकाम पर हूँ…. सारे सफर सताती रही जिंदगी.. थक चुका हूँ थोड़ा आज आराम पर हूँ..।।


मिल गयी है सफलता तो नजरिये बदले है…. जो थे कल दुश्मन आज करीबी निकले हैं…. ना ही बदला हूँ मैं ना ही मेरे अंदाज बदले है….. ये तो बस शुरुआत थी अभी तो पड़ाव अगले हैं…।


मिट जाता, बराबाद हो जाता या बदनाम हो जाता मैं… सफलता की राहों पे गुमनाम हो जाता मैं… शुक्रगुजार हूँ उस खुदा का जिसने हर कदम साध दिया…. कहीं पहुँचता वरना इस मुकाम पर… एक मौत आम हो जाता मैं…।।।


चमक रहा हूँ जो सूरज की तरह तो सब हैरान हैं क्यों….. मेरी कामयाबी से सब इतना परेशान है क्यों…….. हर रात टकराया हूँ मैं एक नई मुसीबत से नई सुबह के लिए.. सबको दिखा हुनर मेरा लेकिन……. किसी ने न पूछा की ये जख्मों के निशान है क्यों..।।


मिली जो मंजिल तो कारवां भी बड़ा लग रहा था….. वरना सफर में हर शख्स मुझे ढग रहा था,…. यूँ ही नहीं पहुंचा हूँ आज मैं इस मुकाम पर,… जब सो रही थी ये दुनिया… तब मैं जग रहा था…।।


कौन कहता है कि बुने हुए ख्वाब सच्चे नहीं होते,….. मंजिलें उन्ही को नहीं मिलती जिनके इरादे अच्छे नहीं होते….. रूखी-सूखी रोटी और धक्के तो बहुत खाए है जिंदगी में लेकिन…. आज देख रहा हूँ कि सफलता के फल कभी कच्चे नहीं होते..।।


चमक रहा है सितारा आज जमाने में मेरे नाम का… मिल गया है नतीजा मुझे मेरे काम का….. किसी चीज की जरूरत न रही मुझे….. जबसे नशा चढ़ गया है मुझे सफलता के जाम का…।।


गिरा रही थी जिंदगी मुझे बार-बार अलग-अलग ठोकरों से,…. बर्ताव कर रही हो जैसे कोई मालिक अपने नौकरों से…… हिम्मत और हौसले को मैंने फिर भी अपनी बैसाखियाँ बनायीं… पहुँच गया सफलता की मंजिल पे..।।


रात नहीं ख्वाब बदलता है…
मंजिल नहीं कारवाँ बदलता है…
जज्बा रखो जीतने का क्यूंकि..
किस्मत बदले न बदले ..
पर वक्त जरुर बदलता है..।। 


डर मुझे भी लगा फासला देख कर..
पर मैं बढ़ता गया रास्ता देख कर..
खुद ब खुद मेरे नजदीक आती गई..
मेरी मंजिल मेरा हौंसला देख कर..।।



जब हौसला बना लिया ..
ऊंची  उड़ान का.. 
फिर देखना  फिजूल है.. 
कद आसमान का..।।    


चलता रहूँगा पथ पर..
चलने में माहिर बन जाऊँगा…
या तो मंजिल मिल जायेगी या
अच्छा मुसाफ़िर बन जाऊँगा…।।



पसीने की स्याही से जो लिखते हैं इरादें को,
उसके मुक्कद्दर के सफ़ेद पन्ने कभी कोरे नही होते… ।।


मौजों की सियासत से मायूस न हो ‘फ़ानी’ 
गिर्दाब की हर तह में साहिल नज़र आता है..।।



साहिल के सुकूँ से किसे इंकार है लेकिन.. 
तूफ़ान से लड़ने में मज़ा और ही कुछ है..।।



गुलामी के जंजीरों से स्वतंत्रता की शान अच्छी..
चंद रूपये की नौकरी से चाय की दुकान अच्छी..।।


प्राइवेट नौकरी पाना इतना आसां नही..
बस इतना समझ लीजिये..
आग का दरिया है और उसमे मजे लेते जाना हैं…।।


ख्वाब पुरे हो गए है मेरे की आज चैन की नींद सोना चाहता हूँ….. बहुत देर से दूर था जिस आँचल से आज उसी माँ की गोद में सोना चाहता हूँ।।


माना कि पहुँच गया हूँ सफलता की उँचाईयों पर आज मैं,… लेकिन लोगों के दिलों में उतरने का हुनर आज भी रखता हूँ।।।


मुझे तो खबर भी न थी की कौन-कौन साथ दौड़ रहा है मेरे…. पहुंचा मंजिल पर तो पता चला की एक लम्बा कारवां मेरे पीछे था।।


एक जमाना ता जब मैं तलाशता था रास्ता आसमान तक जाने का …. एक आज को दौर है की सारा आसमान मेरा है।।।


घिर चुका था जब मुसाीबतों के बीच.. हौसला बढ़ाया तो रुकावटों की ईमारत हिल ही गयी…… बहुत दूर नजर आ रही थी जो एक दिन… कदम बढ़ाया तो आज मंजिल मिल ही गयी..।।

जिस सफर से होकर तू आज मुकाम पर पहुँचा है… उसी सफर में आज की दीवाने चल निकले है….. जानते नहीं नादान इन्हें जरूरत है एक जिद की…
नन्हें कदमों से नापने आसमान चल निकले है।।।


खोटा सिक्का जो समझते थे मुझे … आज मैं उनका ध्यान तोड़ आया हूँ…. जिंदगी की राहों में सफर लम्बा था मेरा… इसलिए कदमों के निशान छोड़ आया हूँ।।



सदा एक ही रुख़ नहीं नाव चलती.. 
चलो तुम उधर को हवा हो जिधर की.. ।।



उसे गुमाँ है कि मेरी उड़ान कुछ कम है.. 
मुझे यक़ीं है कि ये आसमान कुछ कम है..।। 



भीड़ से गुज़रते हाथियों की तरह..
झाड़ियों को रौंदते हुए..
हटाते हुए पेड़ों को अपने रास्ते से..
तुम भी चलो महान् तपस्या की राह पर…।

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