सपनों की उड़ान ।। Sapno ki Udaan

कन्ग्रैचलैशन्ज़ मानसी, आई एम सो हैप्पी फ़ॉर यू,” कॉन्फ़रंस रूम से बाहर निकलते ही रीमा ने मानसी को गले लगाते हुए कहा,‘‘यू हैव डन इट. मुझे यक़ीन था कि यह प्रोजेक्ट तुम्हें ही असाइन होगा, आफ़्टर ऑल तुम इस कंपनी के लिए किसी ऐसेट से कम तो नहीं हो. इतने कम समय मे तुमने कंपनी को जो फ़ायदा पहुंचाया है, उसका क्रेडिट तो तुम्हें मिलना ही चाहिए.”
‘‘थैंक यू सो मच रीमा मैम. आप जैसी क्वालिफ़ाइड और सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर के साथ काम करने का मुझे मौक़ा मिला, यह क्या मेरे लिए कम सौभाग्य की बात है. आपके गाइडेंस में ही मैं लगातार टारगेट अचीव करने में सफल हो पाई हूं.’’
‘‘डोंट भी सो मॉडेस्ट मानसी, यू डिज़र्व इट. तुम एक कंपीटेंट आर्किटेक्ट हो और हमारे क्लाइंट्स तुम्हारे काम की प्रशंसा करते हैं. चलो मिलते हैं लंच पर. आज मेरी तरफ़ से ट्रीट है,’’ रीमा ने मानसी के गालों को हल्के से छुआ और अपने कैबिन की ओर मुड़ गई.

इस कंपनी में आए हुए मानसी को केवल दो वर्ष ही हुए थे, पर इतने कम समय में ही उसने वहां एक ख़ास जगह बना ली थी. वह भी तो अपने टारगेट्स अचीव करने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी. उसके डिज़ाइन्स ऑफ़िस के लिए हों या घर के लिए, बहुत पसंद किए जाते थे और क्लाइंट को समय पर काम देने में भी वह पीछे नहीं रहती थी. इस बार उसे एक रिज़ॉर्ट डिज़ाइन करने का असाइन्मेंट मिला था और इसी बात से रीमा बहुत ख़ुश थी. उसके काम के पैशन को देखकर ऑफ़िस में सभी इंप्रेस थे. रीमा के माध्यम से कंपनी हेड का फ़ीडबैक भी मिलता रहता था. इसीलिए दो साल में दो बार उसे प्रमोशन मिल चुका था. रीमा मैम उसे हमेशा सपोर्ट करती थीं, पर फिर भी कई बार मानसी को लगता था कि कुछ है उनकी मुस्कान के पीछे जो वह देख नहीं पा रही है. लेकिन जब भी वह उसके कंधे थपथपातीं तो वह अपने उन विचारों को अपना भ्रम मात्र समझ झटक देती. और पूरी मेहनत से काम में जुट जाती.
हालांकि कभी-कभी इस बात को लेकर उसकी मनहर से बहस भी हो जाती थी.
‘‘मानसी, आख़िर तुम काम का इतना स्ट्रेस क्यों लेती हो? लेट नाइट्स, घर पर भी काम लाना और हर समय काम के बारे में सोचना…कोई बहुत पुरानी एम्पलॉई तो हो नहीं कंपनी की. जो सीनियर वहां बैठे हैं, कहीं उन्हें तुम्हारा इस तरह इतनी जल्दी आगे बढ़ जाना खटकने न लगे. ऐसी कंपनियां अक्सर तुम जैसे मेहनती और निष्ठावान लोगों को यूज़ करने में भी हिचकती नहीं हैं. तुम बहुत कुछ कर सकती हो और अच्छा काम करके दिखा भी रही हो, यह बात अक्सर किसी इंसान के अगेंस्ट भी चली जाती है. बॉस कभी नहीं चाहता कि उसका जूनियर उससे बेहतर हो. यह ह्यूमन साइकॉलजी है, बस यही समझाने की कोशिश कर रहा हूं.’’
‘‘कैसी बातें कर रहे हो मनहर? काम करूंगी तभी तो प्रोग्रेस करूंगी और हमारी कंपनी में नए लोगों को भी आगे बढ़ने के पूरे अवसर मिलते हैं. मेरी बॉस रीमा बहुत सपोर्टिव हैं. सो जस्ट रिलैक्स.’’
मानसी की बात सुन मनहर मुस्कुराते हुए बोला,‘‘रिलैक्स तो तब करूंगा न जब तुम मुझे अपना क़ीमती समय दोगी? शादी हुए डेढ़ साल हो गए हैं, लेकिन मैडम ने कभी हमें प्रॉपर टाइम दिया ही नहीं.’’

‘‘तो असल बात यह है जनाब,’’ प्यार से मानसी ने मनहर के गालों को सहलाते हुए कहा,‘‘बोलो कितना टाइम चाहिए तुम्हें? कहो तो जॉब छोड़ दूं? आपके लिए तो कुछ भी क़ुर्बान कर सकती हूं,’’ यह कहते-कहते मानसी उसकी बांहों में झूल गई.
‘‘रियली अपना करियर भी…? डोंट बी फ़नी मानसी. तुम एक स्मार्ट, करियर वुमन हो और साथ में इतनी टैलेंट्ड भी. केवल पत्नी बनाकर तुम्हें घर बिठाने की बेवकूफ़ी तो मैं कभी नहीं कर सकता. तुम्हारी सारी एजुकेशन चूल्हे में झोंक दूं, क्या ऐसा टिपिकल और दकियानूसी पति समझा हुआ है तुमने मुझे? यू नो, मैं तो आज का इंटेलिजेंट और अंडरस्टैंडिंग हस्बंड हूं,’’ मनहर ने मानसी को चूमते हुए कहा. उसकी आंखों में शरारत थी और होंठों पर मुस्कान.
‘‘माई डियर इंटेलिजेंट हस्बंड, आख़िर आपका इरादा क्या है…? मन बेईमान हो रहा है क्या?’’
‘‘हां,’’ और मनहर ने मानसी को बांहों में भर लिया.

मानसी इन दिनों कुछ ज़्यादा ही व्यस्त रहने लगी थी. अक्सर उसे क्लाइंट मीटिंग करनी पड़ती थी, क्योंकि उसे बजट और उनकी पसंद को ध्यान में रखकर अपने डिज़ाइन तैयार करने होते थे. क्लाइंट से मिली गाइडलाइंस को ध्यान में रखकर स्कैच और मॉडल बनाकर यथासंभव बेहतर डिज़ाइन का नक्शा तैयार करने में वह घंटों लगा देती. मनहर उसे लंबे समय तक कंप्यूटर पर बैठे देखता रहता, पर उसके डेडीकेशन को देख चुप ही रहता. वह जानता था कि यह उसके लिए काफ़ी चैलेंजिंग प्रोजेक्ट है. उसके डिज़ाइन्स लगभग तैयार हो गए थे. रीमा ने उन्हें अप्रूव कर दिया था, बस क्लाइंट से अप्रूवल लेना था.

इधर मानसी कुछ दिनों से बहुत थकावट महसूस कर रही थी. उसे लगा कि काम के दबाव की वजह से ऐसा होगा. कभी-कभी उसे वॉमेटिंग भी हो जाती थी. उसे लगा कि मौसम का असर होगा इसलिए जब उसने रीमा से एक-दो दिन की छुट्टी लेने की बात की तो वह थोड़ा नाराज़ हो गई.
‘‘दिस इज नो टाइम टू टेक लीव मानसी, यह प्रोजेक्ट जल्दी कंप्लीट करना है हमें. क्लांइट से अप्रूवल मिल जाएगा तो वह काम शुरू कर सकता है और फिर दूसरे शहरों में भी रिज़ॉर्ट बनाने का कांट्रेक्ट भी हमें ही मिलेगा,’’ उसने कहा.

रीमा का व्यवहार मानसी के लिए अप्रत्याशित था. ठीक है कि रीमा बहुत प्रोफ़ेशनल है, पर क्या मानसी को छुट्टी लेने का भी अधिकार नहीं है, वह भी जब वह पूरी तरह से अपने काम के प्रति समर्पित है. मनहर शायद ठीक ही कहता है, उसे कहीं मैनीपुलेट तो नहीं किया जा रहा?
उसके डिज़ाइन्स को क्लाइंट ने जब बहुत पसंद किया तो उसे कंपनी हेड ने पार्टी दी. उसे तब महसूस हुआ कि रीमा उससे कुछ कटी-कटी-सी रहने लगी है. सबका उसकी तारीफ़ करना उसे अख़र रहा था.

‘‘मानसी, इस क़ामयाबी से तुम्हारे काम पर फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए. प्रोफ़ेशनल लाइफ़ में उतार-चढ़ाव बहुत जल्दी आ जाते हैं. एनी वे, कॉन्ग्रेट्स फ़ॉर योर एचीवमेंट!’’
मानसी ख़ुश थी और मनहर भी. कंपनी हेड ने उसे अपनी ओर से एक सप्ताह की छुट्टी दे दी तो रीमा को बुरा लगा. उसने तपाक से कह भी दिया,‘‘सर, एक और प्रोजेक्ट आ रहा है, वी नीड हर फ़ॉर दैट.’’
‘‘वी कैन वेट फ़ॉर अ वीक,’’ कंपनी हेड का सपाट जवाब आया.
रीमा ने एक झूठी मुस्कान उसकी ओर फेंकी थी. न जाने क्यों तब मानसी के मन ने उससे कहा कि वह जिसे भ्रम मान रही है, उसकी सच्चाई की परतें थोड़ी-थोड़ी उतरने लगी हैं और इससे पहले कि सब साफ़ नज़र आने लगे उसे कुछ सोचना ही होगा. कुछ ऐसा जो उसके सपनों के पंखों को कुतर न सके.
छह महीने बाद उसे एहसास हुआ कि वह मां बनने वाली है तो उसकी और मनहर की ख़ुशी का ठिकाना न रहा.
‘‘तुम्हें बेबी प्लान करके करना चाहिए था मानसी डियर,’’ रीमा के स्वर में थोड़ी झुंझलाहट थी,‘‘यू आर एन एजुकेटेड वुमन. इस समय तुम्हारा करियर तुम्हें बहुत आगे ले जा सकता है. प्रेग्नेंसी, बेबी, फिर बेबी संभालने के लिए बहुत सारी लीव…नो, नो…यू विल फ़िनिश मानसी. डू समथिंग. देखो मेरी शादी को दस साल हो गए हैं पर बेबी के बारे में नहीं सोचा, दिस इज़ द टाइम टू ग्रो, यह मैं जानती हूं. वाय डोंट यू एबॉर्ट दिस चाइल्ड? जस्ट कंसंट्रेट ऑन योर करियर राइट नाउ.’’
रीमा के शब्द तीर की तरह लगे मानसी को. आख़िर कैसे कह सकती है वह ऐसे? वह भी तो एक औरत है. करियर ओरिएंटेड होने का अर्थ यह तो नहीं कि मां बनने का सुख ख़ुद से छीन ले? और प्रेग्नेंसी या उसके बाद बेबी, कैसे तरक़्क़ी की राह में आड़े आ सकता है और वह भी तब जब मनहर जैसा सपोर्टिव हस्बैंड हो? बस, सही तरह से मैनेजमेंट और बैलेंस करने की जरूरत होती है…और उसे यक़ीन है कि वह ऐसा कर सकती है. उसे यक़ीन है कि मनहर हर तरह से उसका साथ देगा. नहीं…वह बच्चे को एबॉर्ट कभी नहीं करेगी.

उसके शरीर में जैसे-जैसे बदलाव आ रहे थे, वैसे-वैसे रीमा के व्यवहार में बदलाव आ रहा था. वह जैसे उसके हाथ से काम खींचने लगी थी. कई बार उसके काम का क्रेडिट भी ख़ुद ले लेती थी, क्योंकि अक्सर अब मानसी को छुट्टी लेनी पड़ती थी.
‘‘तुम आउट ऑफ़ शेप हो रही हो मानसी. ट्राय टू बी फ़िट, वरना तुम्हारी प्रोफ़ेशनल लाइफ़ पर इसका असर पड़ सकता है. यू नो, क्लाइंट्स लाइक एेक्टिव एंड स्मार्ट पीपल,’’ रीमा उसे टोकती रहती.
‘‘डोंट वरी और तीन महीने की बात है. डिलीवरी होते ही मैं वापस अपनी शेप में आ जाऊंगी.’’
‘‘ठीक है. मुझे तुम्हारे वो नए डिज़ाइन्स चाहिए जो तुमने मेहता प्राइवेट लिमेटिड के लिए तैयार किए हैं. मुझे मेल कर देना. यह ऑफ़िस कुछ नए स्टाइल का बनना है. क्लाइंट चाहता है कि इसमें काम करने वालों को घर की फीलिंग आए, ताकि वे सहज होकर काम कर सकें. पता नहीं क्या-क्या आइडिया इन दिनों लोगों पर हावी है.’’
मानसी ने सारी फ़ाइल्स या कहें कि अपनी सारी मेहनत रीमा को मेल कर दी. वह डॉक्टर से चेकअप कराने गई थी और जब दोपहर में ऑफ़िस आई तो पता चला कि उन डिज़ाइन्स के प्रिंट निकालकर रीमा क्लाइंट के पास गई हुई है. अगले दिन जब कंपनी हेड ने रीमा को बधाई दी तब उसे समझ आया कि उसके डिज़ाइन्स अपने नाम से रीमा ने क्लाइंट्स और हेड को दिखाए थे. उसने विरोध करना चाहा. लेकिन उसके सहयोगी सब कुछ जानते हुए भी चुप रहे. कंपनी हेड से अपॉइंटमेंट लेने के लिए जब उसने उनकी सेक्रेटरी से बात करनी चाही तो रीमा ने उसके हाथ में एक लैटर थमा दिया.
‘‘रेस्ट करो मानसी डियर. डोंट वरी आबउट वर्क नाउ. तुम्हारी छह महीने की लीव एप्रूव करा दी है मैंने. बाद में चाहो तो और एक्सटेंड करवा लेना.’’
‘‘बट आई डोंट नीड लीव राइट नाउ, आई कैन कम टू ऑफ़िस ऐंड वॉन्ट टू मीट हेड.’’
‘‘अभी हेड बिज़ी हैं. डोंट स्ट्रेस योर सेल्फ़ डियर. आई विल मैनेज एवरीथिंग. वैसे भी तुम्हारे आने से पहले मैं ही सब मैनेज करती थी.’’
मानसी को लगा कि कुछ कहना बेकार है. उसने सारी फ़ाइल्स कंपनी हेड को मेल कर दीं.

शाम को जब वह निकलने लगी तो देखा उसकी कार का टायर पंक्चर है.
‘‘ओह डियर, डोंट वरी. कम आई विल ड्रॉप यू. वैसे भी न जाने फिर कब तुमसे मिलना हो…’’ रीमा ने जैसे कटाक्ष किया. मानो मां बनने का फ़ैसला कर मानसी ने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो. उसने बहुत प्यार से अपने पेट पर हाथ फेरा मानो आने वाले शिशु से कह रही हो कि तुम मेरे लिए बहुत इम्पॉर्टेंट हो.
‍‘‘रीमा मैम, यहां से राइट नहीं लेफ़्ट ले लीजिए,’’ रास्ते में मानसी ने कार चलाती रीमा को टोका.
‘‘लेकिन तुम्हारा घर तो राइट जाकर आता है न, कहीं और जाना है क्याॽ’’
‘‘जी. आपको कुछ दिखाना है.’’

कार जब एक ऑफिस के आगे जाकर रुकी तो रीमा हैरान रह गई. बाहर बोर्ड पर लिखा था-मानसी डिज़ाइंस ऐंड आर्किटेक्ट कंपनी.
‘‘यह क्या हैॽ’’ रीमा हैरान थी और उसके चेहरे पर जलन के भाव भी थे. लग रहा था कि जैसे उसे करारी मात मिली है. वह ख़ुद को हारा हुआ महसूस कर रही थी.
‘‘मेरी कंपनी मैम. पिछले कुछ महीनों से मनहर के साथ मिलकर मैं इस कंपनी को बना रही थी. समझ लीजिए यह मेरा सपना है. मैं आपको सिर्फ़ यह बताना चाहती हूं कि एक प्रेग्नेंट महिला भी अपने सपनों को पूरा कर सकती है. आनेवाला बच्चा उसकी तरक़्क़ी में बाधा नहीं बन सकता, क्योंकि वह दोनों भूमिकाओं को निभाने में सक्षम होती है. मैं अपने करियर को बहुत महत्व देती हूं, पर संतान सुख को दांव पर लगाकर नहीं. मैं मां बनने के एहसास से वंचित नहीं रहना चाहती थी. आप जैसे और भी लोग हैं, जो समझते हैं कि महिलाएं मां बनने के बाद काम करने लायक नहीं रहतीं. पर महिलाओं में दोनों चीज़ों को संभालने की क्षमता है, मैं आपको यही बताना चाहती थी. मैंने तो अपने बच्चे के साथ मिलकर अपने सपनों को पंख देने के लिए उड़ान भर ली है. एनी वे आप अपना जीवन कैसा चाहती हैं यह आपका आउटलुक है. पर हो सके तो किसी प्रेग्नेंट महिला की भावनाओं को हर्ट मत कीजिएगा. मैं यहां से टैक्सी ले लूंगी. मैंने कंपनी हेड को अपना रेज़िग्नेशन लेटर मेल कर दिया है. गुड नाइट रीमा मैम. और हां बेबी के जन्म की ख़बर भेजूंगी आपको, उसे ब्लेसिंग्स देने आइएगा ज़रूर.’’
मानसी ने पास ही खड़ी टैक्सी को इशारे से बुलाया और धीमे-धीमे चलते हुए टैक्सी में बैठ गई. रीमा कुछ देर तक उसी ऑफ़िस के बाहर खड़ी रही. मानसी की टैक्सी दूर जा चुकी थी. उसके सपनों के पंखों की उड़ान उसे बहुत आगे ले जा चुकी थी…

 

 

 

माँ जब काम पर जाती है

इस साल सिंहस्थ होने के बावजूद बहुत सारी शादियों में शामिल होने के निमंत्रण मिले हैं. ऐन वक़्त पर भूल न जाऊं इसलिए डायरी में सबकी तारीख़ें क्रमवार नोट करती जा रही हूं.
पुराने समय में उज्जैन और नासिक में बारह वर्ष में एक बार होनेवाले सिंहस्थ के दौरान गोदावरी नदी और शिप्रा नदी के मध्य क्षेत्र में शादियों के मुहूर्त नहीं रहते थे. पर अब ऐसा नहीं है. धड़ल्ले से शादियों के मुहूर्त निकलते हैं. अब तो लोग देव उठने का इंतज़ार भी नहीं करते.
हां, तो मैं आई हुई निमंत्रण पत्रिकाओं में से डायरी में नाम, तारीख़, समय और स्थान नोट करती जा रही थी, ताकि एक नज़र में जान सकूं कि कब और कहां जाना है. एक बार मुझे विशेष रूप से देखने में आई कि अधिकांश पाणिग्रहण संस्कार गोधूलि वेला में संपन्न होनेवाले हैं, क्योंकि यह स्वयंसिद्ध मुहूर्त होता है.
गोधूलि वेला के बारे में सोचते ही मन हमेशा उस अतीत में दौड़ जाता है, जब मैंने स्वयं इस वेला में एक नए संसार में पदार्पण किया था, जब विवाह के मंडप के नीचे समवेत स्वर में उच्चारित मंगलाष्टक के श्लोक गूंज रहे थे. अग्नि की साक्षी में लिए गए सात फेरे और पति के साथ दोहराए गए सप्तवचन भी याद आते हैं. उस समय भी उज्जैन में सिंहस्थ का अंतिम शाही स्नान संपन्न हुआ था.

साथ ही बड़ी शिद्दत से याद आती है उस बात की, जब गोधूलि वेला में शुभलग्न संपन्न कराने के बाद पंडितजी ने एक रस्म के बतौर हमें आदेश दिया था,‘‘अब नव वर-वधू बाहर जाकर आसमान में अरुंधति के तारे का दर्शन करेंगे. विवाह के बाद अरुंधति के तारे का दर्शन अखंड दाम्पत्य का प्रतीक होता है.’’ मैं पति के उत्तरीय से गठबंधन में बंधी हुई उनके पीछे-पीछे बाहर आंगन में आई. गहराते सलेटी आसमान में छिटपुट तारे झिलमिलाने शुरू हुए थे. मैंने अंदाज़ा लगाया, हम शायद पूर्व दिशा की ओर मुंह करके खड़े थे. पति ने आकाश में तर्जनी से इंगित कर कहा,‘‘इतने तारों के बीच अरुंधति का तारा कौन-सा है. अपने आप छांट लो और दर्शन करो.’’
मैं नववधू थी. मुझे उन्हें टोकना नहीं चाहिए था फिर भी मैं अपनी हंसी नहीं रोक पाई. मैंने कहा,‘‘सुनोजी, पूर्व दिशा में अरुंधति का तारा कहां से लाओगे? क्या इतना भी नहीं मालूम कि सप्तर्षि के तारे,जो उत्तर दिशा में होते हैं और उनके साथ नन्हा-सा टिमटिमाता तारा अरुंधति का होता है, जो सप्तर्षि में से एक ऋषि वशिष्ठ की पत्नी थीं.’’
‘‘मैं ठहरा साहित्य का विद्यार्थी. मैं धरती पर विचरता हूं, आकाश में नहीं. मुझे तारामंडल का कोई ज्ञान नहीं है. मैं तो बस इतना ही जानता हूं कि आज मेरे पहलू में चांद ज़रूर उतर आया है,’’ उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाकर कहा था. बस, ये शब्द ही मुझे गुदगुदाने के लिए काफ़ी थे. इतना सुनकर ही अखंड दाम्पत्य के प्रतीक अरुंधति के तारे के दर्शन अपने अन्तर्मन के आकाश में करना सार्थक हो गया.

उस गोधूलि वेला में संपन्न अपने विवाह की स्मृति जीवनभर के लिए हृदयपटल पर अंकित हो गई. उसके बाद मैंने कई बार अपने जीवनसाथी को उत्तरदिशा में सप्तर्षि तारों के पार्श्व में स्थित अरुंधति के तारे के दर्शन कराए हैं, परंतु उस दिन उनके पहलू में उतरा यह चांद वक़्त के थपेड़ों में अपनी कलाओं में घटता रहा, बढ़ता रहा, कई बार उस चंद्र को ग्रहण भी लगा और कई बार शरद पूर्णिमाएं भी आईं और गईं. फिर भी मन के किसी कोने में बसी उस गोधूलि वेला की स्मृति आज भी अमिट है.
वैसे सच तो यह है कि आज शहरों की सिमेन्टीकृत सड़कों और उसपर दौड़ते हुए वाहनों की भीड़ में गोधूलि वेला का वास्तविक अर्थ और सौंदर्य न जाने कहां खो गया है. हर किसी को कहीं न कहीं पहुंचने की जल्दी और चौराहों के रेड सिग्नल पर रुके अनगिनत वाहनों की कतारों से निकलता डीजल-पेट्रोल का कड़वा धुंआ अनचाहे ही फेफड़ों में उतारने को अभिशप्त मन आज भी उस गोधूलि को ढूंढ़ता है.

ख़ैर, गोधूलि का मनोहारी दृश्य तो गांवों में ही देखने को मिलता था, जब हम छुट्टियों में ननिहाल जाते थे. पर बचपन में एक प्रश्न मुझे हमेशा मथता था कि संझाकाल को ही गोधूलि वेला क्यों कहते हैं. गाएं जब सुबह झुंड में जंगल की ओर चरने जाती हैं, उस समय भी उनके खुरों से धूल तो उड़ती ही है फिर उस समय को गोधूलि वेला क्यों नहीं कहते?
नानी से पूछा तो वे मेरी मूर्खता पर हंस पड़ी,‘‘अरे बुद्धू, इतना भी नहीं समझती? आज ध्यान से देखना, जब गाएं सुबह चरने के लिए जंगल जाती हैं, तब वे अपने नन्हे-नन्हे छौनों को भरपेट दूध पिलाकर, जंगल में चरने के लिए आराम से जाती हैं. इसलिए उस समय ऐसी धूल नहीं उड़ती है. पर शाम को घर लौटते समय, अपने भूख से बेहाल नन्हे छौनों की याद उन्हें ऐसा विह्वल, अधीर कर देती है कि वे गले में बंधी घंटियों को बेसब्री से टुनटुनाते हुए, एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ मचाती हुई घरों की ओर दौड़ लगाती हैं. तब उनके खुरों के आघात से गांव की कच्ची सड़कों पर धूल का अंबार छाने लगता है इसलिए इसे गोधूलि कहते हैं. गाय के खुरोंके स्पर्श से यह धूल भी इतनी पवित्र हो जाती है कि इसे धूल न कहकर रज कहकर, गोरज नाम भी दिया गया है.

उस समय गोधूलि से जुड़ा यह भावनात्मक अर्थ मेरी बाल बुद्धि में स्पष्ट नहीं हुआ था. पर बहुत बाद में, तब समझ में आया, जब मेटर्निटी लीव ख़त्म होने पर तीन महीने की नन्ही किन्नी को घर छोड़कर नौकरी पर जाना पड़ा. सुबह उसे नहला धुलाकर, दूध पिलाकर, सासू मां के पास छोड़कर जाते समय दिमाग़ में समय पर, ऑफ़िस पहुंचने की जल्दी, ताकि रोज़-रोज़ बॉस की डांट न सुननी पड़े, साथ ही ऑफ़िस के कामों से संबंधित विचार चक्र तेज़ी से घूमता रहता था. फिर सारा दिन ऑफ़िस के कामों को निपटाते हुए निकल जाता.
पर शाम होते न होते दिमाग़ की एक दूसरी ही खिड़की खुल जाती. आंखों के सामने अबोध किन्नी का भोला-सा मुखड़ा कौंधने लगता. बस, उस समय मेरे अंदर पूंछ फटकारती, घर की ओर विह्वल होकर दौड़ती गाय बेसब्री से रंगाने लगती थी. उस वक़्त बस यही सोचती थी कि राह में आई हर बाधा को लांघकर किसी तरह पलभर में अपने छौने के पास पहुंच कर उसे अपने सीने से लगा लूं. उस समय गोधूलि का वास्तविक अर्थ बहुत गहराई से मेरे अंन्तस्थल में समा गया था.
यह सिलसिला अनवरत चलता रहा और आगे न जाने कितने सालों चलता रहनेवाला था. तीन साल बाद मिन्नी हुई और फिर तो हर शाम घर लौटते समय अपनी दोनों बेटियों के पास पहुंचने की बेहाली में मेरे अंदर गोधूलि के समय घर की ओर दौड़ लगाती गाय रंभाती रही.

बस, किसी तरह एक-एक दिन गुज़रता रहा. किन्नी-मिन्नी बड़ी हो रही थीं. अब सासू मां भी नहीं रहीं. किन्नी आठवीं क्लास में पढ़ रही थी और मिन्नी छठी में. स्कूल सेआते समय दोनों बहनें बस से सोसायटी के गेट पर उतर जातीं. पास-पड़ोस भी बहुत अच्छे मिले. वे भी दोनों का ध्यान रखते थे.
मेरी आदत थी कि रोज़ घर से निकलने के पहले दोनों बेटियों के लिए कोई न कोई मैसेज क्लिप बोर्ड पर लगा देती थी, जैसे-‘आज गाजर का हलवा या खीर बनाई है. रायता फ्रिज में रखा है. सब्ज़ी गर्म कर लेना. दूध पी लेना. होमवर्क कर लेना. लव यू. बाय. शाम को मिलते हैं.’. प्राय: मैसेज खाने-पीने संबंधी हिदायतों के होते थे.
एक दिन घर से निकलने के पहले जैसे ही क्लिप बोर्ड पर मैसेज लगाने लगी तो देखा वहां पहले से ही एक मैसेज मेरे लिए लिखा था. किन्नी ने लिखा था,‘ममा, हमारे पेट की चिंता मत किया करो. हमारे दिल की भी सुनो. रोज़ स्कूल बैग से चाबी निकालकर, घर का ताला खोलकर सूने घर में घुसना हमें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता.
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि दरवाज़ा खोलकर तुम हमें रिसीव करो, फिर प्यार से खाना गरम करके हमें परोसो. ममा, क्या ऐसा नहीं हो सकता?’
पढ़ते-पढ़ते ही मेरी आंखें बरसने लगीं. ये बेबसी के आंसू थे. पति-पत्नी दोनों को मिलकर गृहस्थी की गाड़ी खींचने की बेबसी. इस नौकरी से इनकी उच्च शिक्षा का सपना साकार हो सकेगा. फिर एक दिन किन्नी, मिन्नी मेरा घोंसला सूना करके अपने-अपने नीड़ का निर्माण करने अलग-अलग दिशाओं में उड़ जाएंगी. किसी कॉरपोरेट सेक्टर मेंजॉब करेंगी (जहां जाने का समय तो निर्धारित रहता है, पर घर लौटने का नहीं) और तब इनकी भी कोई नन्ही-सी जान पलक बिछाए किसी क्रैश में या किसी नैनी के भरोसे इनकी राह तकेगीऔर तब गोधूलि वेला में आज मेरे अंदर रंभा रही गाय तब इनके अंदर दौड़ेगी. तब घर लौटने की बेसब्री और उत्कंठा से इन्हें भी ऐसे ही रूबरू होना पड़ेगा, जैसे आज मैं हो रही हूं. समय चक्र तो ऐसे ही चलेगा और चलता रहेगा. यह गोधूलि हर कामकाजी मां की नियति है.

 

छोड़ा हुआ

‘‘आज अनुज इंजीनियर हो गया है. यूं तो ये बड़ी ख़ुशी का दिन है, पर मेरे लिए ये दिन अपना फ़ैसला सुनाने का भी है. मैं अपना निर्णय लेने के लिए इसी दिन का इंतज़ार कर रही थी. सुदीत के ब्याह के बाद अनुज की फ़िक्र थी कि वो अपने पैरों पर खड़ा हो जाए बस… बाक़ी रही उसकी शादी-ब्याह की बात तो मुझे भरोसा है कि सुदीत और नेहा ये काम निपटा देंगे.

तुम ये सोच रहे हो कि मैं ये क्या और क्यों लिख रही हूं, वो भी बिना संम्बोधन के. दरअसल, ज़िंदगी का पहला पत्र तुम्हें लिखने बैठी हूं तो सबसे पहले तो यही तय नहीं कर पा रही हूं कि तुम्हें क्या कहकर सम्बोधित करूं? क्योंकि मैं तुम्हारी या तुम मेरे तो कभी रहे ही नहीं. तुम्हारे द्वारा दिए गए नाम से तुम्हारे परिवार में तो जीवनभर मुझे ‘छोड़ी हुई’ कहकर ही सम्बोधित किया गया था. हां! छोड़ी हुई. यह हमारे देश, समाज में विडम्बना ही है कि जो महिला अपने अनकिए अपराध के लिए भी क्षमा न मांगे वो हमेशा लोगों की आंखों की किरकिरी ही बनी रहती है. मेरे साथ भी यही हुआ. पूर्व पति और ससुरालवालों के साथ तालमेल न बैठा, क्योंकि वे लोग हद से ज़्यादा बर्बर थे. उनका बेटा डिप्रेशन का शिकार है, ये जानते हुए भी उसकी शादी मुझसे करवाई, वो भी हमें धोखे में रखकर. मैं जीवनभर वो यातनाएं भुगतने को तैयार न थी और उन लोगों से छुटकारा पा लिया. लेकिन ‘छोड़ी हुई’ का तमगा तो मेरे ही सीने पर लगना था.

पर तुम बताओ. तुमने क्यों एक ‘छोड़ी हुई’ महिला से विवाह किया? ताकि ज़िंदगीभर मुझे ज़लील करते रहो? या पापा की सम्पति पर तुम्हारी लार टपक रही थी. लेकिन ये सारी बातें तो बाद में ही समझ में आती हैं ना? उस वक़्त जब पुरोहित अंकल के ज़रिए रिश्ता आया तो तुम और तुम्हारे घरवाले मेरे पापा को साक्षात देवता ही लग रहे थे. इतना बढ़िया लड़का उनकी तलाक़शुदा बेटी को फिर से ब्याहने को तैयार था, वे तो बेचारे तुम्हारे गुणगान करते नहीं थकते थे. कहते फिरते थे ऐसे समाज सुधारक दामाद के तो चरण धोकर पियूं तो भी कम है!’’

कितने ग़लत थे पापा! तुमने उस समय अपना रूप पापा के सामने कैसा प्रस्तुत किया होगा, मुझे आश्चर्य होता है. सिंह या भेड़िया भी कभी अपना मूल स्वभाव नहीं छिपा पाता? पर इंसान, वो तो ये आसानी से कर लेता है. उस वक़्त की तुम्हारी लच्छेदार बातें, तुम्हारा सुदर्शन व्यक्तित्व, तुम्हारी समाज सुधारक की छवि के मोहपाश में बेचारे पापा ऐसे बंधे कि उन्हें तुममें विवेकानन्द की झलक दिखने लगी थी. हे भगवान! पापा कितने भोले थे ना! कुछ शुभचिंतकों ने कहा भी,‘दर साहब, ज़रा पता कर लीजिए, कोई सर्वगुण संपन्न लड़का भला एक तलाक़शुदा से क्यों ब्याह करेगा?’ लेकिन पापा के मानस में तो तुम्हारी देवता-सी छवि अंकित थी. अत: उन्हें अपने शुभचिंतक ही दुश्मन लगने लगे. ‘मेरी बेटी के लिए इतना बढ़िया लड़का मिल गया तो अपनेवाले ही जलते हैं साले,’ पापा की इस प्रतिक्रिया पर बोलनेवाले बेचारे चुप रह गए. पापा को लगता था मेरी पहली शादी ने मुझे जो संताप दिया, वो सारा तुम्हारे साथ घर बसते ही छू हो जाएगा. हर पिता यही चाहता है कि उसकी बेटी के जले पर कोई गुलाबजल के फाहेरख दे. पर पापा कहां जानते थे कि शारीरिक कष्ट भुगत चुकी बेटी को वे मानसिक यंत्रणा देनेवाले के हाथ सौंप रहे हैं. जिस दिन तुम्हारे घर में पहला क़दम रखा, पहले वाक्य में मेरे लिए ‘छोड़ी हुई’ संबोधन था. धीरे-धीरे मुझे पता चलने लगा कि, तुम्हारे घर…नहीं मकान…नहीं बंगले में वैसे भी महिलाओं के प्रति सम्मान नाम की कोई चीज़ नहीं थी और महिलाओं के उस हुजूम में मैं सबसे निकृष्ट वस्तु थी-छोड़ी हुई. ‘औरतों को इज़्ज़त नहीं देनी चाहिए वर्ना वो माथे पर बैठती हैं… वो मुंह लगाने की नहीं पैरों में रखने की चीज़ हैं…वगैरह…जैसे तुम्हारे उच्च विचार मुझे धीरे-धीरे पता चलने लगे. इस दुर्भावना के पीछे कोई ऐसा कारण घरवालों से भी नहीं पता चला. बस! सब कहते थे तुम ऐसे ही थे. आज हिम्मत कर रही हूं तो कह सकती हूं कि-ऐबले…!’
तुम बरामदे में बेंत के फ़र्नीचर पर अपना दरबार-सा लगाए रहते और मैं तुम्हारे हुक़्म की तामिल करती, चाय-नाश्ते में जुटी रहती. घर की हर महिला यहां तक कि तुम्हारी मां भी तुमसे ख़ौफ़ खाती थी, पता नहीं क्यों? मां-पापा से एकाध बार कहने की कोशिश भी कि आपके दामाद वैसे नहीं, जैसे आप समझते हैं, पर वो तो तुम्हारे सुनहरे व्यक्तित्व की चमक से अब तक मुक्त नहीं हुए थे. फिर मेरे भीतर बैठी वो परंपरागत रूढ़ियों में जकड़ी हिन्दुस्तानी लड़की भीरू हो गई. ‘एक बार शादी टूट चुकी है, दूसरी बार बढ़िया लड़का मिला, फिर भी पटरी नहीं बैठ रही है तो ज़रूर लड़की में ही कोई खोट होगा.’ लोग तो यही कहेंगे और मेरे मां-पापा बेचारे कैसेजी पाएंगे? इसी आम भारतीय मानस ने मुझे भीरू और दब्बू बना दिया और मैं ख़ुशी-ख़ुशी अपने ही शोषण में सहभागी हो गई.दो बेटों का पिता बनने का सौभाग्य देकर भी मैं तुम्हारी कृपापात्र नहीं बन सकी. हां, तुम्हें इतनी ख़ुशी थी कि मैंने बेटी नहीं जनी, लेकिन मैं हमेशा एक बेटी के लिए तरसती रही. शायद वो मेरे कलेजे को ठंडक प्रदान करती, पर लगा जैसे तुम्हारे ख़ौफ़ से ही बेटी मेरे गर्भ में नहीं आ सकी.
कभी-कभी उम्मीद करती थी कि बेटे बड़े होकर अपने पिता के उद्वेग को शायद ठंडा कर देंगे और मैं कुछ राहत पा सकूंगी. पर वे भी मेरी ममता की छांह में कम, तुम्हारे ख़ौफ़ व रोब की गर्मी में ज़्यादा रहे और मेरी तमाम उम्मीदें धराशायी हो गई.

बीतते समय के साथ ‘छोड़ी हुई’ सुन-सुनकर मैं तो अपना मूल नाम ही भूलती गई. बेटे बड़े हुए तो दो बातों का डर लगने लगा. कहीं मेरी बहुएं भी मुझे ‘छोड़ी हुई’ नाम से न बुलाने लगें और दूसरे बहुओं के साथ तुम्हारा व्यवहार न जाने कैसा होगा? वे भी तो आख़िर नारी जाति ही रहेंगी ना. लेकिन पत्थर के भगवान ने न जाने तुम्हें भी किस पथरीली मिट्टी से गढ़ा कि नेहा में भी तुम्हें झुकाने का दम नहीं था. तुम्हारे व्यवहार से आहत होकर उसने दबे स्वर में दो-एक बार विरोध भी किया, पर एक तो सुदीत ने उसका साथ नहीं दिया और दूसरे तुम्हारी ओर से दी गई तलाक़ की धमकी से उसके मां-बाप घबरा गए. और मैं देख रही थी कि सुदीत में भी कोई दम-खम नहीं था. मैं सोचती थी कि समाज में बदलाव आ रहा है. पर 30 साल पीछे मुड़कर देखती हूं तो अपने, नहीं-नहीं… तुम्हारे घर में कोई बदलाव नहीं आया है!

पर आज मैं उसी बदलाव की शुरुआत करने जा रही हूं, जो मुझे बरसों पहले कर देना चाहिए था. तुमने मुझे अपनाया, नहीं-नहीं… अपनाया नहीं कह सकती. मेरे साथ शादी की, वो भी ज़िंदगीभर ये एहसास दिला कर कि ये एक पुरुष का एहसान है. अहं ब्रह्मास्मि का तुम्हारा ये दंभ तोड़कर आज मैं तुम्हें छोड़कर जा रही हूं. सिर्फ़ एक कसक के साथ कि बच्चों की याद ज़रूर आएगी… मैं जा तो रही हूं, पर मरूंगी नहीं. अब तक तुम्हारे घर में बहुत अचार-बड़ी बनाई, पापड़ बेले, अब मेरा यही काम मेरी सम्मानित जीविका का ज़रिया और जीने का मक़सद बनेगा. जहां रहूंगी चैन और सुकून से रहूंगी. जैसा मैं चाहती हूं, वैसा रहूंगी. उम्र के पचासवें पड़ाव पर घर-परिवार यूं छोड़ना अजीब ज़रूर लग रहा है, पर अब और पीड़ा मैं नहीं सहूंगी! यदि मैं मर जाती तो तुम मुझे सदा सुहागन के श्रृंगार में मुखाग्नि देते और लोग तुम्हें बेचारा विधुर, यही कहते, पर मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. अब, जबकि मैं तुम्हें छोड़कर जा रही हूं तो लोग तुमसे मेरे बारे में सवाल करेंगे. वे तुम्हारे सामने भले ही हिम्मत न जुटा पाएं लेकिन पीठ पीछे तो ज़रूर कहेंगे-‘इसके अहं और ख़ड़ूसपने के कारण ही इसकी बीवी इस उम्र में इसका साथ छोड़ गई. बेचारी को ख़ूब बेज़्ज़त किया. इतने सालों तक उसने सहन किया, पर अब शायद उसकी सहनशीलता जवाब दे गई होगी, तभी बेचारी इसे छोड़ गई! हां, मैं तुम्हें छोड़ रही हूं और आज से तुम ‘छोड़े हुए’ हो. और अब ‘छोड़े हुए’ ही रहोगे.’’

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